सोमवार, 31 दिसंबर 2012

चुप्पी का इशारा कभी


चुप्पी का इशारा कभी, किया था सनम ने 
लबों पे ठहरी है, ख़ामोशी आज भी 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र'

रविवार, 30 दिसंबर 2012

मेरी चाहत कि तुझे


मेरी चाहत कि तुझे सांसों से छू लू सनम ।
मेरी तमन्ना कि तुझे आंखों से पी लूं सनम ।।
जाने फ़िर, आयेंगे ये लम्हे कौन जाने, 
इस एक पल में सारी ज़िंदगी को जी लूं सनम ॥

-अंकित  कुमार 'नक्षत्र'

अश्कों मे खोना चाहता हूं



अश्कों मे खोना चाहता हूं ।
मै दिल से रोना चाहता हूं ।
जो दाग दिये मैने तुझको,
मै उनको धोना चाहता हूं ।
जागा हूं गहरी निद्रा से,
ना अब मै सोना चाहता हूं ।
तेरे दिल की गलियों में मै,
छोटा सा कोना चाहता हूं ।
तेरे गम की परछाई का,
ना बोझा ढोना चाहता हूं । 
तुझको समेट आंचल मे मै,
सम्पूर्ण होना चाहता हूं ।

-अंकित कुमार 'नक्षत्र '

भरी महफ़िल में


भरी महफ़िल में नहीं सज पाए जो 'नक्षत्र' 
आज अपने प्यार की मुलाकातों में सजे 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र' 

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

सारे शहर की गलियों में


सारे शहर की गलियों  में,  छानी  ख़ाक जिसके  लिए 
क्या मालूम था वो 'नक्षत्र' मेरे दिल में छुपा बैठा है 

-अंकित कुमार 'नक्षत्र ' 

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

मेरे हाथों मे



मेरे हाथों मे जो तेरा हाथ आ गया ,
जाने कैसा सुरूर इस दिल पे छा गया ।
तमन्ना थी जाने की बहुत दूर लेकिन ,
लौटकर मै वापस तेरे दर पे आ गया ।
इंतेहां जो आज तूने की मौहब्बत की ,
इक अज़नबी अहसास मेरे दिल मे समा गया ।
नही छू पाया कोई मेरे दिल के तार, मगर 
पल भर मे ही तू मुझे अपना बना गया ।
सदियों से थी अंधेरी गलियां मेरे दिल की ,
तू आज़ अमावस रात में दिवाली मना गया ।
ना आते थे परिंदे भी चौखट पे मेरी,
तू फ़िर से मेरा उज़डा हुआ जहां बसा गया ।

-अंकित कुमार 'नक्षत्र' 

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

खंज़र उठाने की ज़रुरत



खंज़र उठाने की ज़रुरत नही है तुम्हे ,
ये बेरुखी ही काफ़ी है, मुझे कत्ल करने के लिए ।
रकीबों के संग तूने शब गुजार दी,
क्यों दिया ये गम तूने, मुझे बेवक्त मरने के लिए ॥

-अंकित कुमार नक्षत्र 

आज दिन है कुछ खास,



आज दिन है कुछ खास,
ना अब होना तू उदास ।
मै करूंगा तुझसे प्रेम ,
जो आयेगा तुझे रास ।
तुम आओगे मेरे दिल मे,
लिए बैठा हूं मै आस ।
एक कोना मेरे लिए भी,
तेरे दिल में होता काश ।
फ़ैल जाता तेरे दिल में,
मेरे प्रेम का प्रकाश ॥

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

अब तो चिराग संग शब मे



अब तो चिराग संग शब मे जलने लगे हम ।
पाकर गम-ए-मौहब्बत फ़िर से पिंघलने लगे हम ॥
कभी ढूंढने से भी घर नही मिलता था हमे, 
क्यों आज अपने घर से दूर निकलने लगे हम ॥
कभी डूबे रहते थे नासूर-ए-जलालत में,
क्यों पाकर जरा सा दर्द आज फ़िसलने लगे हम ॥
दर्द-ए-जुदाई की याद फ़िर से आई तो,
पर कटे पंछी की तरह मचलने लगे हम ॥
बिछडकर तुमसे हालात कुछ ऐसे हुए,
डूबते हुए सूरज की तरह ढलने लगे हम ॥

यूं तो हम कभी मजबूर ना थे



यूं तो हम कभी मजबूर ना थे चलने के लिए ।
तूने किया काम ऐसा बेबस हुए संभलने के लिए ।
हालत तेरी मौहब्बत ने कर दी कुछ इस तरह,
पंछी हो गया बैचेन, पिंजरे से निकलने के लिए ॥

- अंकित कुमार नक्षत्र 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

उम्मीदों का चिराग अभी बुझा नही है



उम्मीदों का चिराग अभी बुझा नही है ।
तेरे दिल से मेरा दिल अभी उलझा नही है ।।
तुम क्या जानोगी, ये दिल की बाते है ।
यहां हार-जीत नही होती, ये जुआ नही है ॥ 
दिल तुम्हारा मुझसे करता है दिल्लगी, 
शायद तुम्हे प्यार मुझसे हुआ नही है ॥
कट जाता जिन्दगी का सफ़र आहिस्ता, मगर,
मेरे संग तेरे दिल की दुआ नही है ॥
सारे गमों को मैने अपने सीने में समा लिया ।
मेरा दिल तो दरिया है, कुआ नही है ।

                                                            -अंकित कुमार 'नक्षत्र' 

खुशियों की बहारें आई है



खुशियों की बहारें आई है।
कुछ ठंडी फ़ुहारे आई है ॥
मेरा तन-मन उसमें भीग गया ।
मै नज़रे लडाना सीख गया ॥

कितनी सुन्दर उसकी काया ।
कैसी विचित्र उसकी माया ॥
जब-जब भी वो मुस्काती है ।
बागों में बहारें आती है ॥

दिल उसकी ओर खिंचा जाता है ।
मन छित्र-भित्र हो जाता हैं ॥
दिल की चाहत देखूं उसकों ।
मन की चाहत सोचूं उसकों ।।

कितनी मोहक मुस्कान है वो ।
कितनी सुन्दर पहचान है वो ॥
सांसों में मेरी समा गई ।
मेरे दिल का अरमान है वो ॥

-अंकित कुमार 'नक्षत्र' 

रविवार, 16 दिसंबर 2012

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

प्रेम-पत्र -3

पलक,
        आजकल मेरा मन बहुत अधिक विचलित रहने लगा है । तुम्हारे-मेरे बीच मे जो ये दूरी है, मै इसे मिटा देना चाहता हूं । तुमसे मिलने की तृष्णा राई से पहाड बन चुकी है । पल-प्रतिपल तुम्हारे विषय में विचार करके मेरे अन्तर्मन की क्लान्तता बढती जा रही है । वास्तव में ही इंसान बहुत बेबस और निर्बल होता है । शायद मै भी उसी अवस्था में हूं । मै अपने स्वयं के विचारों को नियंत्रित नही कर पा रहा हूं । कभी-कभी इच्छा होती है कि तुम मेरे निकट, इतने निकट आ जाओ कि ये दुनिया हम दोनों तक ही सिमट जाए या फ़िर हम दोनों इस जहां से इतनी दूर चले जाए जहां परिंदे भी पर ना मार सके ।
        मै तुम्हे किसी बंधन में नही रखना चाहता हूं। मै तो उस अदृश्य बंधन की कल्पना कर रहा हूं जो हमे परस्पर बांधे रखे, तुम चाहकर भी मुझसे दूर ना जा सको । मै जानता हूं कि तुम्हारी बेचैनी भी कम नही है। तुम्हारे मन मे भी मुझसे मिलने की वही तडप, वही कशिश मौज़ूद है, जो मेरे दिल मे, है । मुझे उस क्षण की प्रतीक्षा है जब समय भी हमारे बीच मे दूरी नही बना पाएगा ।

………प्रतीक्षारत
तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा 'नक्षत्र'

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

प्रेम -पत्र 2

स्वीटी,
        जब आंखे तेरे दिए हुए अश्कों से सराबोर हो गई, जब दिल तेरे दिए हुए जख्मों से लहुलूहान हो गया, जब कर्णपल्लव तेरे व्यंग्य-बाणों से आहत हो गए , जब तेरे नाम को इन होठों पर लाने का साहस ना रहा मुझमे , तब भी इस दिल से तेरे लिए दुआ ही निकली ।
        लेकिन  अगर तुम मुझसे दूर रहकर ही प्रसन्न हो, तो मै क्यों तुम्हारे जीवन मे विष घोलने का घृणित कार्य करुं । मुझे तुम्हारे जीवन मे बलपूर्वक प्रवेश करने का कोई अधिकार नही है । मै उन निकृष्ट प्रेमियों मे से नही हूं जो धोखा दिए जाने पर अपने प्रेमी का अहित कर बैठूं ।
        किंतु क्या सिर्फ़ नाराज़गी की वजह से संबंधो को समाप्त किया जा सकता है ? मै स्वीकार करता हूं कि मैने कुछ ऐसी बाते कह दी थी जो अभी तक तुम्हारे अन्तःकरण मे शूल की भांति चुभ रही होंगी ।किंतु मैने वो सब क्रोध के वशीभूत होकर कहा था । क्रोध में व्यक्ति अपने दिल की बात नही कहता, वह केवल दूसरे के दिल को पीडा देना चाहता है । परंतु संबंध समाप्त करना इतना सरल नही है, जितना तुम्हे प्रतीत हो रहा है । क्या तुम कभी मेरे साथ व्यतीत किए हुए उन प्रेमपूर्ण क्षणों को अपनी स्मृति से विस्मृत कर पाओगी ? तुम शायद कर भी सकों, लेकिन मेरे लिए तो ये असंभव है । मै तुमसे दूर जाने के बारे में सोच भी नही सकता । इस विचार मात्र से ही मेरा मन विचलित होने लगता है । मै स्वयं को संभालने के लाख प्रयत्न करता हूं, किंतु सफ़ल नही हो पाता हूं ।
        मुझे तो अभी तक यही अहसास था कि वो प्रेम का ही बंधन है जो हम दोनो के दिलों को बांधे हुए है और जो हमे एक-दूसरे से जुदा नही होने देता । लेकिन ये सोचना शायद मेरी भूल थी । अगर वास्तव में प्रेम था, तो नाराज़गी की वजह से घृणा करने का कोई औचित्य नही है  । अगर तुम्हे मुझसे प्रेम होता, तो तुम शब्दों से आहत होकर दुःखी होती, ना कि नाराज़ होकर इस तरह का व्यवहार करती । मै भी जाने क्या-क्या सोचने लगा ? मै तो आज भी यही दुआ करता हूं कि जहां भी रहो, खुश रहना ।


"ना खिल पाया कोई फूल गुलशन में मेरे, 
                          काँटों से उलझती रही अंकित की आरज़ू "

                                                                                                     -तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा विजय

हाथों मे हाथ डालकर

हाथों मे हाथ डालकर जब चले थें हम,
सारे जमाने की नजरों से ढले थे हम ।
सही थी जलालत-औ-रुसवाई सारे जहां की ,
फ़िर भी इरादे से अपने ना हिले थे हम ।
जुदा करने की हमें लाख कोशिशों के बाद भी,
शहर की पुरानी गलियों मे फ़िर मिले थे हम ।
सारे खंजर हो गए थे खून के प्यासे ,
बचकर काफ़िरों से किसी तरह निकले थे हम ।
बडी बेरहम है दुनिया ये जालिमों की।
जख्मों को अपने किसी तरह सिले थे हम ।
बडे बोझिल थे जुदाई के वो लम्हे, मगर
मिलने के बाद फ़ूलों की तरह खिले थे हम ॥

रविवार, 9 दिसंबर 2012

भूलकर सबको बना



भूलकर सबको बना, दिवाना कुछ ऐसा,
पर आखिर तूने बना दिया, बेगाना कुछ ऐसा,
यादों से भी तेरी मै हो गया महरूम,
किस्मत ने बुना ताना-बाना कुछ ऐसा ।
एक झलक तेरी पाई, दुश्मन सारे लोग हुए,
जमाना भी हो गया सयाना कुछ ऐसा ।
दर्द-ए-इंतेहा हुई ,आंसूं ना बहा सके,
तूने मेरे संग किया कारनामा कुछ ऐसा ।
बाते सदियों लंबी थी, जबां काट ली तुमने,
जाने कहां से ढूंढा तुमने, बहाना कुछ ऐसा ।
दिल को किया लहुलूहान, जान लेकिन छोड दी,
लगाया था तुमने क्यों निशाना कुछ ऐसा ।

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

गुनाह-ए-अज़ीम

गुनाह-ए-अज़ीम हो गई मौहब्बत अब तो ।
आने लगी है याद कयामत अब तो ।।
ना जाने किसके पहलू में छिपकर रोएंगे हम,
सारे शहर ने की है जलालत* अब तो ॥

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* जलालत = बेइज्ज़ती


शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

ना तीर का कोई छोर था


ना तीर का कोई छोर था
ना ही दिल का कोई छोर था ।
वो तीर दिल में चुभाते चले गए ।
हम दर्द को दिल में समाते चले गए ।।
उनकी तमन्ना हमारे चेहरे पर दर्द आए ।
जकड जाए हम, आंखे सर्द हो जाए ॥
दर्द खंज़र से नही, उनकी बेरुखी से था ,
मगर क्या करे 'अंकित' को प्यार भी उन्ही से था ॥
वो इक बार मुस्कुरा कर तो कहते हमसे,
आंसूं तो क्या, दर्द-ए-लहू बहाते दिल से ॥
तमन्ना उनकी-औ-हमारी दिल में ही रह गई ।
हम मुस्कुराते रहे, वो देखती रह गई ॥

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

क्यों, आखिर क्यों



एक शहर ,
सब अंजान,
बनते है ये दिलवाले,
लेकिन नफ़रत ओढे हुए।
क्यों,
आखिर क्यों,
क्या यही दस्तूर है इस शहर का ।

एक मोहतरमा,
कुछ जानी-पहचानी,
बाते करती है आंखों से,
लेकिन नज़रे हिकारत भरी ।
क्यों,
आखिर क्यों,
क्या यही शउर है इस शहर का ।

एक दीवाना,
कुछ बेगाना सा,
मुस्कान को लपेटे हुए,
और लोग उसे पत्थर मारे ।
क्यों,
आखिर क्यों,
क्या यही नासूर है इस शहर का ।

रविवार, 2 दिसंबर 2012

तुम हो मेरी प्रेरणा


तुम हो मेरी प्रेरणा, तुम मेरा विश्वास ।
पाकर तुम्हे जागी है, जीने की इक आस ॥
यूं तो लाखों लोग यहां मिले मुझको लेकिन ।
जगह तुम्हारी है इस दिल में सबसे खासमखास ॥
गलियां भी अंधेरी थी, अंधेरे थे रास्ते ।
तुम्हे देखकर मिल गया मुझे नया प्रकाश ॥
इच्छा यही विश्राम करूं तेरी जुल्फ़ों की छांव में ।
प्रेम करूंगा मै तुमसे, बिना किसी अवकाश ।।
मिली हो जबसे तुम, मुझे मिल गया जीवन ।
है साक्षी इस बात के धरती और आकाश ॥

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

प्रेम पत्र -1



        'पलक', तुम्हारा प्रेम देखकर मै तडप उठता हूं । कितना यकीन, कितना अधिक विश्वास है तुम्हे मुझ पर । मै तो मात्र यही सोचकर सहम जाता हूं कि अगर कभी तुम्हे मुझसे दूर रहना पडा, तो कैसे रह पाओगी तुम ? तुम्हारी मनोदशा क्या होगी ? शायद उसके बाद तुम किसी पर विश्वास ना कर पाओ ।मै तुमसे हमेशा यही कहता हूं "मुझसे इतना प्रेम ना करो पलक, मै उसके योग्य नही हूं ।" किंतु, आज तुम्हारे प्रेम के आधिक्य के कारण ही मै खुद को बेबस महसूस कर रहा हूं । मुझे स्वयं से अधिक तुम पर विश्वास हो चला है । मैने तुम्हारा दिल दुखाया, मात्र यह सोचकर कि तुम मुझसे घृणा करो । लेकिन मै शायद वही भूल गया था, जो स्वयं कहता हूं कि '' अगर कुछ घटनाओं के कारण आप अपने प्रेमी से घृणा करने  लगो तो इसका अर्थ यही है कि वहां प्रेम था ही नही, घृणा दबी हुई थी कहीं गहरे में, जो थोडा सा मनमुटाव होने पर प्रकट हो गई है । '' परंतु तुम्हारे प्रेम ने मुझे सत्य कहने को विवश कर दिया, मै स्वयं को और अधिक नही रोक पाया और तुम्हारे सम्मुख सब कुछ कह दिया '' हां, पलक हां, मै भी तुमसे उतना ही प्रेम करता हूं जितना कि तुम मुझसे, बल्कि उससे भी कही ज्यादा । तुमसे मिलन की वही तीव्र उत्कंठा मेरे मन में भी रहती है, जो तुम्हारे मन में है। अब मै कुछ भी नही छिपाना चाहता , सब कुछ शीशे की तरह साफ़ कर देना चाहता हूं । किसी का डर नही है मुझे । मै तुम्हारा प्रेम स्वीकार करता हूं, पलक, स्वीकार करता हूं |

-तुम्हारा और सिर्फ़ तुम्हारा 'विजय'